कैप्टन रूप सिंह के जन्म दिन पर विशेष आलेख राम और लक्ष्मण की तुलना नहीं की जा सकती है

सोमेश्वर दत्त सिंह के घर  8 सितंबर 1908 को मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में  दुनिया के महानतम हाकी खिलाड़ी कैप्टन रूप सिंह का जन्म हुआ । हम सभी भारत वासियों के लिए आज गर्व करने का दिन है जब हम कैप्टन रूप सिंह जी 113 वी जन्म जयंती  को मानने जा रहे है। आसमान में जब चांद अपनी 24 कलाओं के साथ उदित होता है तो सिर्फ और सिर्फ उसके रूप  का ही  वर्णन  होता है और चांद उस  रूप से ही संसार में  अपनी छंटा  बिखेरता है  अपने रूप के बिना चांद  कुछ भी नही है और जब चांद आसमान में उदित होता है तो वह अपने  मनमोहक रूप से ही सबको आकर्षित करता है ठीक उसी प्रकार दुनिया के हांकी क्षितिज पर ध्यानचंद ने अपने रूप के साथ मिलकर  अपनी हांकी  कला की ऐसी छंटा  बिखेरी की  दुनिया की हांकी  उनके खेल की रोशनी से जगमगा    उठी।रूप सिंह ने अपनी  प्रारंभिक हांकी का  जीवन अपने भाई  ध्यानचंद को खेलते देख हीरोज मैदान झांसी से ही प्रारंभ किया । जैसे बड़े भाई ध्यानचंद हांकी खेलते  वैसे ही मैदान के बाहर खड़े होकर रूप सिंह  उस अभ्यास को दोहराते। ये सिलसिला चलते रहा और फिर उनकी लग्न और हांकी के प्रति उनके  समर्पण को देखकर ध्यानचंद ने उन्हें मैदान के भीतर खेलने के लिए बुला लिया और  रूप सिंह  हीरोज हांकी कल्ब के नियमित  खिलाड़ी के रूप में चुन लिए गए और जब हम कैप्टन रूप सिंह को याद करते है तो  हीरोज मैदान के इस वर्ष 100वर्ष पूरे होने के स्वर्णिम पल  और स्वर्णिम इतिहास को भी  अपने आप   जीवित कर देते है।बाद में चलकर रूप सिंह  का चयन राष्टीय  हांकी प्रतियोगिता में सेंट्रल प्रोविनिसेज की टीम से हुआ जहा उनके शानदार खेल से प्रभावित होकर  चयनकर्तओ ने रूप सिंह का चयन 1932 भारतीय ओलंपिक हांकी टीम के लिए कर लिया गया।

भारतीय हांकी टीम लॉस एंजिलिस ओलंपिक के लिए समुद्री मार्ग से जापान होते हुए अमेरिका पहुंची  ।जहां 4अगस्त 1932 को उसका पहला  मुकाबला जापान  से हुआ और भारत ने उस मुकाबले को 11 के मुकाबले 1 से एकतरफा जीत दर्ज करते हुए  तहलका मचा दिया इस मैच में रूप सिंह ने तीन गोल किए और फिर 11अगस्त 1932 को भारत ने अपना आखिर राउंड रॉबिन मैच दुनिया का महाशक्तिशाली देश अमेरिका के खिलाफ खेला और भारत ने 24के मुकाबले 1गोल से अमरीका को  रौंदते हुए भारत की  झोली में दूसरा स्वर्ण  पदक डाल दिया । इस मैच में रूप सिंह ने 10 गोल किए और  ये दोनो कीर्तिमान  24गोलों से ओलंपिक में जीत और किसी भी खिलाड़ी  द्वारा ओलंपिक हांकी में एक मैच में  10गोल करने का  कीर्तिमान जो रूप सिंह ने  स्थापित किया वह आज भी ओलंपिक इतिहास में  अजेय और  अविजित है। इसी दौरान ध्यानचंद और  कैप्टन रूप सिंह की मुलाकात हॉलीवुड के सबसे बड़े कलाकार चार्ली चैप्लिन से भी हुई है ।1932 के स्वर्णिम जीत के बाद 1935में रूप सिंह ने ध्यानचंद की कप्तानी में न्यूजीलैंड ऑस्ट्रेलिया का सफलतम दौरा  संपन्न किया जहा रूप सिंह ने 180 गोल दागकर अपने खेल कौशल की अनूठी मिसाल कायम कर दी और ध्यानचंद जी रूप  सिंह के गोल करने की क्षमता पर टिप्पणी करते हुए कहते है की मैं खुश हु की रूप सिंह ने इतनी बड़ी संख्या में गोल कर भारतीय हांकी टीम को  मैचों में  लगातार विजय दिलाते हुए भारतीय हांकी को नई ऊंचाई प्रदान की हैऔर इसके बाद वह ऐतिहासिक 1936का बर्लिन ओलंपिक है जिसकी कहानी आज भी दुनिया में  याद की जाती है और   बार बार  दोहराई जाती है फाइनल मैच मुकाबला  जर्मनी से घरेलू मैदान घरेलू दर्शको का शोर और  तानाशाह हिटलर की जोश भर देने वाली उपस्थिति और एक  रात पहले पानी गिर जाने से मैदान की परिस्थितियां भी  भारतीय हांकी टीम के प्रतिकूल थी  मैच शुरू होने के साथ ही  जर्मन  खिलाड़ी भारतीय खिलाड़ियों पर हावी हो गए और ऐसा लगने लगा की यह मुकाबला  कही जर्मनी न जीत जाए ध्यानचंद जी ने अपने जूते उतार दिए यह  देख कैप्टन रूप सिंह ने भी अपने जूते उतार फेके और फिर क्या था दोनो भाई भारतीय टीम खिलाड़ियों के साथ भूखे शेर की   भांति  जर्मनी पर टूट पड़े  भारत की और से पहला गोल  रूप सिंह  ने दागा और फिर देखते ही देखते भारत ने  सात और गोल करके जर्मनी को 8के मुकाबले 1गोल से परास्त करते हुए भारत के लिए तीसरा स्वर्ण पदक विजेता होने का गौरव हासिल कर लिया हिटलर इस  शर्मनाक पराजय को देखने के पूर्व ही मैदान  छोड़ने पर मजूबर हो चुका था और संयोग  देखिए जहा पहला गोल रूप सिंह ने किया वही आखिरी गोल मेजर ध्यानचंद ने किया  ऐसा लगता है की दोनो भाईयो  की   इशारों इशारों में बातचीत हो  गई हो की रूप  जीत  की शुरुआत की  नीव  तू रख और जीत  की इमारत  खड़ी कर  शानदार स्वर्णिम जीत का   समापन अंतिम गोल करके  करता हू। किसी ने श्रीमती जानकी देवी से पूछा था की आप दोनो में किसे  श्रेष्ठ  मानेगी तब उन्होंने सुंदर जबाव दिया  था की राम लक्ष्मण की तुलना नहीं की जा सकती वास्तव में भारतीय हांकी की भाईयो की यह जोड़ी राम लक्ष्मण की ही जोड़ी है जिसकी तुलना  नहीं की जा सकती है  जैसे राम के प्राण लक्ष्मण में  है ठीक उसी प्रकार ध्यानचंद जी की हांकी में रूप सिंह जी की हांकी रचती बसती है ।

ओलंपियन अशोक कुमार ने अपनी हांकी अपने पिता  ध्यानचंद जी से नही  बल्कि अपने  चाचाजी रूप सिंह से सीखी और देश का गौरव बढ़ाया।

    दुनिया ने रूप सिंह को मान सम्मान दिया 1972 म्युनिख ओलंपिक के दौरान उनके नाम से  म्यूनिख शहर में सड़क का नाम रूप सिंह के नाम पर रखा गया जिससे देश का  सम्मान बढ़ा और  जो देश वासियों के लिए गौरव का विषय है  और इन पलो के  गवाह स्वयं ओलंपियन अशोक कुमार बने जो 1972 म्युनिख ओलंपिक में भारत की ओर से खेलने गए हुए थे ठीक इसी प्रकार  2012 के लंदन ओलंपिक में यू ट्यूब स्टेशनों में तीन भारतीय हांकी  खिलाड़ियों के   हांकी के  जादूगर ध्यानचंद ,महान हांकी खिलाड़ी  काल्डियस  के  साथ  रूप सिंहजी  के नाम पर रखकर ओलंपिक कमेटी ने भारत को  सम्मानित  किया लेकिन दुर्भाग्य की  बात है की  कैप्टन रूप सिंह को भारत सरकार और हांकी को चलाने वाले वह  सम्मान नही दे  पाए  जिसके  कैप्टन रूप सिंह  हकदार रहे  है।मेरा मध्यप्रदेश के हांकी प्रेमी मुख्यमंत्री माननीय शिवराज सिंह जी चौहान  से अनुरोध है जबलपुर हांकी एस्ट्रो टर्फ मैदान का नाम कैप्टन रूप सिंह जी के  स्म्रति में  करने के साथ साथ मध्यप्रदेश में रूप सिंह खेल अवार्ड की  घोषणा करके कैप्टन रूप सिंह जी स्मृति को स्थाई बनाने का कार्य करने की कृपा करें।

आइए आज  महान हांकी  खिलाड़ी रूप सिंह की जन्म जयंती पर हम उन्हें याद करे और  भाईयो की इस चमकदार जोड़ी  की  यादों को ताजा  करे  जिनके खेल से भारत का नाम दुनिया में रोशन   हुआ और हमेशा हमेशा के लिए वे दोनो चांद  और और सितारे  की भांति इस दुनिया में अजर अमर  हो गए।

हेमंत चंद्र दुबे (बबलू) बैतूल