खिलाड़ी तो सरकारो की बात सुनते है और मानते है लेकिन खिलाडियों की बात सरकारें क्यो नही मानती

भारत के महान खिलाडी मिल्खा सिंह जिन्होंने भारत का परचम तिरँगे को 1960 रोम ओलिम्पिक में विश्व किर्तिमान रचते हुये फहराया किन्तु उनका और भारत का दुर्भाग्य रहा कि पदक विजेता होने का गौरव हासिल करने से वे और भारत चूक गए लेकिन उनके द्वारा स्थापित विश्व किर्तिमान आज भी ट्रैक एंड फील्ड की दुनिया मे भारत के नाम को रोशन किये हुये है और यही कारण रहा कि मिल्खा सिंह जी ने जब इस दुनिया को अलविदा कहा तो पूरा देश गमगीन हो गया क्या खास और क्या आम सब दुःख के महासागर में डूब गए ।भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री किस किस ने उनके निधन पर शोक और संवेदना नही व्यक्त की किन्तु विडम्बना देखिये जिस शख्स को इतना मान सम्मान दिया गया हो उसी इंसान की बातों पर सरकारो में बैठे नुमाइंदों ने कितना महत्व दिया यह हम सब जानते है यदि उनकी बातों को समझा जाता और उस पर क्रियान्वयन होता तो ओलिम्पिक में हम पदकों के लिए तरसते नही दिखते हमारे देश मे भी सैकड़ो पदक विजेता भारत का नाम रोशन कर रहे होते । जिस दिन से खेलो में भारत रत्न देने का रास्ता साफ हुआ उस दिन से लेकर अपनी अंतिम सांसों तक मिल्खा सिंह ध्यानचन्द जी को भारत रत्न देने की वकालत करते रहे और वे मेजर ध्यानचन्द को भारत देने की वकालत इसलिये नही करते थे कि यह सम्मान ध्यानचंद जी को केवल दे दिया जाए क्योकि उन्होंने तीन स्वर्ण पदक ओलिम्पिक मे जीते थे बल्कि जब वे ध्यानचन्द जी को भारत रत्न देने की बात करते थे तब उनका केवल एक सोच होता था कि उनके सम्मानित होने से भारत का नोजवान प्रेरित होगा और प्रेरणा ले सकेगा कि किस तरह मेजर ध्यानचंद ने अपने देश के लिए जो कामयाबियां हासिल की वह किस कठिन परिश्रम से विपरीत परिस्थितियों में देश के लिये उन्होंने दिलवायी साथ ही ध्यानचन्द जी को सम्मान मिलने का अर्थ होगा भारत के प्रतेयक खिलाड़ी का सम्मान क्या छोटा और क्या बड़ा क्योकि हर खिलाडी अपने मे ध्यानचन्द जी छवि को बसाता है और उससे वह अपना खेल जीवन को आगे बढ़ता है और वे कहते थे कि- ध्यानचन्द की कामयाबियों में सबसे अहम यह है कि उन्होंने भारत को आजादी से पहले दुनिया के सबसे बडे मंच ओलिम्पिक में एक नही तीन लगातार तीन सुनहरे तमगे स्वर्ण पदक भारत की झोली में डाले वे स्वयं इस बात को स्वीकारते थे कि ध्यानचन्द जी ने अपनी जिंदगी को हाथ की लकीरों और तक़दीर से नही बल्कि अपने आत्मबल और मेहनत की दम पर उसका निर्माण किया। था । जिसने मुझे भी जीवन भर प्रेरित किया और इसलिए वे अपने उदगारों में हमेशा कहते रहे कि- हाथ की लकीरों से जिंदगी नही बनती ,मन की शक्ति भी कुछ होती है जिंदगी बनाने में।।वे कहते थे खेलो से दिलो की दूरियां कम होती है खेल मोहब्बत के पैग़ाम होते है और इसी बात को बताते हुये वे कहते है कि जब भारत पाकिस्तान के रिश्ते सुधारने के उद्देश्य से उन्हें दौड़ने के लिये पाकिस्तान आमंत्रित किया गया तो उन्होंने वहां जाने से साफ इंकार कर दिया वजह साफ थी कि मिल्खा सिंह उस धरती पर वापिस नही जाना चाहते थे जिस धरती पर उनके माता पिता भाई बहनों का सिर धड़ से उनकी आंखों के सामने अलग कर दिया गया था देश के विभाजन की त्रासदी को उन्होंने सहा था इसलिये वे वहाँ नही जाना चाहते थे तब देश के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने उनसे अपील की नही मिल्खा नही देश के खातिर मोहब्बत का पैग़ाम लेकर आपको पाकिस्तान जाना होगा और दौड़ना होगा मिल्खा सिंह मान गए और वे वहाँ दौड़ने के लिये लाहौर पहुचे होटल में जाकर रुके तो पाकिस्तान के अखबारों का शीर्षक था भारत और पाकिस्तान की टक्कर होगी – मिल्खा सिंह खालिद यार का संघर्ष आदि आदि यह सब बात पढ़कर सुनकर मिल्खा सिंह जी को दुःख पहुचा उन्होंने प्रेस से कहाँ आप लोगो ने यह ठीक नही किया हम यहाँ अपने देश से मोहब्बत का पैग़ाम लेकर आये है इसमें यह संघर्ष वाली बात ठीक नही मेरे मुल्क ने आपके साथ मिलकर खेल खेले है विशेष रूप से हॉकी के मैदान पर ध्यानचन्द दारा की कामयाब जोड़ी को कौन भूला सकता है जिसने भारत को लगातार तीसरा ओलिम्पिक स्वर्ण पदक विजेता होने का गौरव बर्लिन ओलिम्पिक में तानाशाह हिटलर के सम्मुख दिलवाया था। मिल्खा सिंह स्टेडियम में दौड़ने के लिए तैयार हुये साठ हजार से अधिक दर्शक उस समय स्टेडियम में मौजूद थे खालिद यार ट्रैक पर मिल्खा सिंह के बगल में खड़े थे तब ही दो मौलवी मैदान पर आए और उन्होंने खालिद यार के सिर पर हाथ रखते हुये कहाँ ख़ुदा हाफिज आपको दुश्मनों पर फ़तह मिले मिल्खा सिंह को यह बात नागवार गुजरी उन्होंने आगे बढ़कर मौलवी जी से कहां मौलवी जी हम भी उसी ख़ुदा के बंदे है जिसके आप है इसमें दुश्मन वाली बात कौनसी है और कहां से आ गयी फिर उन मौलवियों ने मिल्खा सिंह के सिर पर हाथ रखकर कहाँ खुदा आपको भी फतह दिलवाये मिल्खा सिंह खूब बेहतरीन दौड़े हवा को चीरते हुये उन्होंने भारत का परचम मोहब्बत का परचम तिरँगे को लाहौर के स्टेडियम में फहरा दिया तब वहां उपस्थित पाकिस्तान जनरल अयूब खान ने मिल्खा सिंह को उड़न सिख की उपाधि से नवाजा ।संयोग देखिये ध्यानचन्द भी हमेशा भाईचारे और मोहब्बत का संदेश लेकर ही देश के लिये दुनिया मे गए और खेले और यही कुछ केमेस्ट्री ध्यानचन्द और मिल्खा सिंह के बीच रही है जो मिल्खा सिंह हमेशा ध्यानचन्द के सममान के लिए इस देश की सरकारो से गुहार लगाते रहे। आज मिल्खा सिंह हमारे बीच नही रहे लेकिन उन्होंने खेल और खिलाडियों के लिए जो बातें कही और कार्य किये है उस पर सरकारों को अम्ल करना चाहिए। हम चंद दिनों बाद टोक्यो ओलिम्पिक में हिस्सा लेने के लिए रवाना होंगे काश मिल्खा सिंह जी जैसे महान खिलाडी का वह सपना की मेजर ध्यानचन्द को भारत रत्न मिले सरकारें पूरा करती तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होती । वह खिलाड़ी जिसने देश के प्रधानमंत्री की एक अपील पर की मिल्खा सिंह जी आपको देश के लिये मोहब्बत का पैग़ाम लेकर पाकिस्तान जाना होगा औऱ दौड़ना होगा अपने साथ हुये दुःखद हादसे को भी भुलाकर देश के लिए दौड़ने के लिए तैयार हो गए लेकिन जब उस महान खिलाडी ने ध्यानचन्द के सममान की विनती की तो उसके सपनों को सरकारें चकनाचूर कर देती है यह बात समझ से परे हो जाती है।इस देश की विडंबना देखिये सरकारो की बात तो खिलाडी एक पैर पर खड़े होकर मानने के लिए तैयार हो जाते है लेकिन खिलाडियों की बात सरकारें मानने के लिये तैयार नही होती है । काश मेरे देश की सरकारें मिल्खा सिंह जी जैसे महान खिलाडियों का सपना पूरा कर पाती और उनकी बात विनती को स्वीकार कर पाती।
आज ट्रैक एंड फील्ड की दुनिया की उड़न परी भारत की महान धाविका पी टी उषा का जन्मदिन है उन्हें भारत की ओर से ,खेल प्रेमियों की ओर से अनेकानेक शुभकामनाएं है और उनके जन्मदिन पर आशा की एक किरण की सरकारें खिलाडियों की बातों को मानेगी और समझेंगी टोक्यो ओलिम्पिक के लिए भारतीय खिलाड़ी दल को बहुत बहुत शुभकामनाएं ।

हेमंत चंद्र दुबे (बबलू) बैतूल

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